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Showing posts from February, 2010

हश्र - ए- इंसान

सितारे हँसतें हैं सितारों के हश्र पर. जो कभी अर्श पर, तो कभी फर्श पर. ज़मीन चीखती है, सुन ऐ मगरूर आदमी, हर जान चल रही है, अपने अपने कब्र पर.

पैदाइश

नया -  नया सा है दिन,  किसी नए की तैयारी है. जो खुली आँखों में भी ख़्वाबों का आना जारी है. नए इरादों ने दस्तक दी है ज़ेहन पर, उम्मीद उम्मीद से है, दिल का पैर भारी है.

ताल्लुकात

दूर मिलतें हैं ज़मीं-ओ-आसमां, ज़रूरी है. बना रहे उफ़क़ का गुमां, ज़रूरी है. क़रीब आते ही बढ़ जातीं हैं दूरियां, एक फासला हमारे दरमयां, ज़रूरी है.

वो जो नहीं है

वो जो शब का माहताब था. और सहर का आफताब था. वर्क़ पूछतें हैं कि कहाँ गया, वो एक लफ़्ज़ किताब था ...फ़राज़ साहब के नाम.

उम्मीद

ज़िन्दगी लम्हा दो लम्हा ठहरने तो दे. गिरह -ए- ग़म से उम्मीद का धागा सुलझने तो दे. यहीं कहीं है बहार राहत की, खारों से भरे शाखों को ज़रा बहकने तो दे.

चाँद

तन दे दिया, मैंने मन दे दिया. फिर भी न मानी, तो जीवन दे दिया. जो कहा मुझे चाँद लाकर दो फ़कीर, मैंने उनके हाथ में दरपन (दर्पण) दे दिया.

सड़क

कहीं इतना ज़्यादा उजाला, अच्छा नहीं लगता. कहीं अँधेरा इतना काला, अच्छा नहीं लगता. कहीं रोटी के लिया रास्तों पे रोते बच्चे, ये देखकर निवाला अच्छा नहीं लगता.

नूर तेरा

किसकी बिंदिया, किसकी अंगूठी, किसका कंगन है सूरज. रूप है किसका सोने जैसा, किसका तन मन है सूरज. जिसके नूर से रौशन रौशन रहता है जग सारा, मुझे पता है किसके नूर से, इतना रौशन हैं सूरज.

दुआ

बाहर ढूँढना उसे बहुत मुश्किल है. मेरे दिल में ही मेरा कातिल है, खुदा उसको उससे ही महफूज़ रखे, शीशे सा बदन है, मगर संगदिल है.

वफ़ा

तिरी ज़फ़ा के ज़ख्म लिए ज़िन्दा हूँ मिरी जां. तिरी नाकामी पे बहुत शर्मिंदा हूँ मिरी जां. चिपका हूँ उस शजर से जिसके पत्ते भी साथ नहीं, क्या करूं, कोई भौंरा नहीं, परिंदा हूँ मिरी जां.

फुंसी

गोरे गाल पर हाय वो गुलाबी फुंसी रूख्सार चूमकर हो गयी शराबी फुंसी उसके बहाने छू लेता हूँ सनम को है हुस्न की तिजोरी की चाभी फुंसी

आईना

देखा न जाने उन्हें किस नज़र से आईना जो देख रहे हैं वो सर-ए-सहर से आईना ख़ुद ही को दिल दे बैठोगे सनम, देखा न करो यूं मिरी नज़र से आईना

ख़ुदकुशी

तक़दीर ने क्या मुझसे दिल्लगी की है. समंदर परोसा जब भी तलब -ए- तिश्नगी की है. उस खंजर पर मिले हैं मेरे ही उँगलियों के निशान, मेरे क़ातिल कह रहे हैं कि मैंने ख़ुदकुशी की है.

सूखा

लहू सूखकर जमा नसों में, कोई सरिया जैसे बूढ़े हो गए सूखकर बच्चे, बढ़ी उमरिया जैसे धरती सूखी, अम्बर सूखा, सूखा - सूखा सावन, सूखी - सूखी मेरी सुराही, कोई दरिया जैसे.

मुफ़लिसी

बदन में नहीं खूँ, फिर खूँ कैसे खांसा मैं बनकर ग़रीब ऐ फ़कीर बन गया हूँ तमाशा मैं रहता है सावन हर मौसम जिस जगह पे' मरा वहीँ दरिया किनारे प्यासा मैं.

ख़बर

वो संग सफ़र है, हमसफ़र नहीं है सायेदार है बहुत मगर शजर नहीं है यूं तो भरे रहतें हैं अख़बार मरने वालों से, किसी उम्मीद का मरना मगर ख़बर नहीं है.

हिम्मत

ख़ुदा की ख़ुदायी की अज़मत तो देखिये लू हो गयी हवा चराग़ से, बग़ावत तो देखिये. कब्र पर उग रहीं हैं नयी कोपलें, शजर के बच्चों की हिम्मत तो देखिये.

तन्हाई

ए काश कि तेरी याद आई नहीं होती मैं तन्हा होता मगर तन्हाई नहीं होती तेरे बगैर इस क़दर हो गया तन्हा मैं, कि अब मेरे साथ मिरी परछाईं नहीं होती.

फ़रियाद

मैंने तुमसे कब माँगा कोई मुझे खज़ाना दो. या अल्लाह! भूख लगी है, बस थोडा सा खाना दो. रोटी नहीं तो मर्ज़ दो, मौत दो, मातम दो, भूखे बच्चे रो रहे हैं, कोई और बहाना दो.

नसीब

फिर मेरे दिल से ग़म इक ताज़ा निकला दरवाज़े के पीछे दरवाज़ा निकला रौशनी की उम्मीद जब की कभी, धुवें के कंधे चरागों का जनाज़ा निकला....

तन्हाई

अपनी मजबूरियों से कितना मजबूर आदमी जिस्म से क़रीब दिल से दूर आदमी वो शख्स जो कल रात तन्हाई में मरा, कहते थे कभी उसको मशहूर आदमी

डाकिया

कुछ वादे, कुछ इरादे, कुछ शिकवे, कुछ शिकायत भेज दो. फिर से कोई पयाम -ए- मुहब्बत भेज दो. फिर बनाओ उसको अपने इश्क़ का डाकिया, फिर छिपाकर उस किताब में कोई ख़त भेज दो.

हौसला

परकटो को दे हौसलों को पर, फिर उन्हें परिंदा करूंगा. दो अन्धेरो को रगड़कर, रौशनी जिंदा करूंगा. शब् के सीने पर लहराऊंगा मैं बनके चराग़, शाम से डरे सूरज को मैं शर्मिंदा करूंगा.

नाज़ुकी

रंग क्या है, चांदनी के उजाले हैं. दो होंठ गुलाबी पंखुड़ियों के प्याले हैं. इस क़दर नाज़ुक हैं सनम मिरे, ख़्वाब में चले थे, पांव में छाले हैं.

तुम्हारे लिए (क़ता)

ज़िन्दगी से भी ज़्यादा किसी से प्यार, अच्छा नहीं होता. मौत तक किसी का इंतज़ार, अच्छा नहीं होता. उठ उठ कर गिर जातीं हैं हया से तुम्हारी पलकें, गुलाबी पंखुड़ियों पर इतना भार, अच्छा नहीं होता

तरक्की (क़ता)

चाँद सबका, सूरज सबका, सबका शब -ओ- सबेरा है. फिर किसने लिखा ज़मीन पर, ये तेरा है, वो मेरा है. तुम कहते हो तरक्की का सूरज चमक रह है भारत पर, मैं पूछता हूँ, फिर क्यूँ मेरे झोपडे में अँधेरा है

रफ़ू (क़ता)

आओ तुमको खुद सा हू - ब - हू कर दूं. इश्क की हकीक़त से रु - ब - रु कर दूं. दर्द ही दर्द की दवा है मेरी जान, ज़ख्म पे ज़ख्म से रफ़ू कर दूं

खामोशी (क़ता)

वो जुबां से कब किधर बोलती है. खामोशी उसकी मगर बोलती है. शोर करने लगता है सन्नाटा, जब कभी उसकी नज़र बोलती है.

एक अश्लील क़ता

बोटी से रोटी का व्यापार है, कोई क्या करे. उसकी मजबूरी उसका इश्तिहार है, कोई क्या करे. तवायफ़ की बेटी की बदनसीबी तो देखिये, बाप ही उसका खरीददार है, कोई क्या करे

बेघर (क़ता)

वो मुझसे मिलतें हैं कुछ इस तरह शबनम से जैसे सूरज हर सुबह बेघर हो गयी जान मिरी, तोड़कर दिल मेरा बेवजह.

आईना ( क़ता)

एक दूसरे में झांकने को इस क़दर परेशां थे. दोनों ताज्जुब में थे, दोनों हैरान थे. देर तक देखता रहा आईना, और आईना मुझे, दोनों में ज़िन्दगी थी, दोनों बेजान थे.