नया - नया सा है दिन, किसी नए की तैयारी है. जो खुली आँखों में भी ख़्वाबों का आना जारी है. नए इरादों ने दस्तक दी है ज़ेहन पर, उम्मीद उम्मीद से है, दिल का पैर भारी है.
कहीं इतना ज़्यादा उजाला, अच्छा नहीं लगता. कहीं अँधेरा इतना काला, अच्छा नहीं लगता. कहीं रोटी के लिया रास्तों पे रोते बच्चे, ये देखकर निवाला अच्छा नहीं लगता.
किसकी बिंदिया, किसकी अंगूठी, किसका कंगन है सूरज. रूप है किसका सोने जैसा, किसका तन मन है सूरज. जिसके नूर से रौशन रौशन रहता है जग सारा, मुझे पता है किसके नूर से, इतना रौशन हैं सूरज.
तिरी ज़फ़ा के ज़ख्म लिए ज़िन्दा हूँ मिरी जां. तिरी नाकामी पे बहुत शर्मिंदा हूँ मिरी जां. चिपका हूँ उस शजर से जिसके पत्ते भी साथ नहीं, क्या करूं, कोई भौंरा नहीं, परिंदा हूँ मिरी जां.
तक़दीर ने क्या मुझसे दिल्लगी की है. समंदर परोसा जब भी तलब -ए- तिश्नगी की है. उस खंजर पर मिले हैं मेरे ही उँगलियों के निशान, मेरे क़ातिल कह रहे हैं कि मैंने ख़ुदकुशी की है.
लहू सूखकर जमा नसों में, कोई सरिया जैसे बूढ़े हो गए सूखकर बच्चे, बढ़ी उमरिया जैसे धरती सूखी, अम्बर सूखा, सूखा - सूखा सावन, सूखी - सूखी मेरी सुराही, कोई दरिया जैसे.
मैंने तुमसे कब माँगा कोई मुझे खज़ाना दो. या अल्लाह! भूख लगी है, बस थोडा सा खाना दो. रोटी नहीं तो मर्ज़ दो, मौत दो, मातम दो, भूखे बच्चे रो रहे हैं, कोई और बहाना दो.
कुछ वादे, कुछ इरादे, कुछ शिकवे, कुछ शिकायत भेज दो. फिर से कोई पयाम -ए- मुहब्बत भेज दो. फिर बनाओ उसको अपने इश्क़ का डाकिया, फिर छिपाकर उस किताब में कोई ख़त भेज दो.
परकटो को दे हौसलों को पर, फिर उन्हें परिंदा करूंगा. दो अन्धेरो को रगड़कर, रौशनी जिंदा करूंगा. शब् के सीने पर लहराऊंगा मैं बनके चराग़, शाम से डरे सूरज को मैं शर्मिंदा करूंगा.
ज़िन्दगी से भी ज़्यादा किसी से प्यार, अच्छा नहीं होता. मौत तक किसी का इंतज़ार, अच्छा नहीं होता. उठ उठ कर गिर जातीं हैं हया से तुम्हारी पलकें, गुलाबी पंखुड़ियों पर इतना भार, अच्छा नहीं होता
चाँद सबका, सूरज सबका, सबका शब -ओ- सबेरा है. फिर किसने लिखा ज़मीन पर, ये तेरा है, वो मेरा है. तुम कहते हो तरक्की का सूरज चमक रह है भारत पर, मैं पूछता हूँ, फिर क्यूँ मेरे झोपडे में अँधेरा है
बोटी से रोटी का व्यापार है, कोई क्या करे. उसकी मजबूरी उसका इश्तिहार है, कोई क्या करे. तवायफ़ की बेटी की बदनसीबी तो देखिये, बाप ही उसका खरीददार है, कोई क्या करे
एक दूसरे में झांकने को इस क़दर परेशां थे. दोनों ताज्जुब में थे, दोनों हैरान थे. देर तक देखता रहा आईना, और आईना मुझे, दोनों में ज़िन्दगी थी, दोनों बेजान थे.