मुफ़लिसी

बदन में नहीं खूँ, फिर खूँ कैसे खांसा मैं

बनकर ग़रीब ऐ फ़कीर बन गया हूँ तमाशा मैं

रहता है सावन हर मौसम जिस जगह पे'

मरा वहीँ दरिया किनारे प्यासा मैं.


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