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Showing posts from April, 2010
चलो हादसा एक हसीन करतें हैं. मौसम के वादे पर यक़ीन करतें हैं. हुस्न पर ऐतबार कौन नहीं करता, ये ग़लती तो बड़े बड़े ज़हीन करतें हैं.
इंसान जाने किस ग़फलत में होता है. जो ख़ुद ही राहों पे कांटे बोता है. दैर-ओ-हरम की लड़ाई में लुट गई बस्तियां, मरी माँ से चिपककर, बेघर ख़ुदा रोता है.
पतंगों के दरम्यान जो दूरी है. उनकी   कोई   मजबूरी   है. रिश्ते     क्या    हैं    पेंचे    हैं, इक  फ़ासला  बहुत  ज़रूरी   है.
कितनी शिरी में लिपटी मेरी जान तेरी ज़ुबान है. ज़ुबान  है या रसगुल्ले की दुकान है. मुझे है शक्कर, और चख रहा हूँ लब-ए-शक्कर, मेरी जान तेरा आशिक़ दो दिन का मेहमान है.