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Showing posts from March, 2010

इश्क़

वो मेरा इंतिहा भी है, इब्तिदा भी. मुझमें मौजूद भी है, मुझसे जुदा भी. इश्क़ से बच सका है कौन, इसकी ज़द में इंसा भी है, ख़ुदा भी

कब्रगाह

दबी कुचली सी हर चाह होती है. भटकी भटकी सी हर राह होती है. ग़रीब की आँखें आँखें कब होतीं हैं, ये तो ख़्वाबों की कब्रगाह होती है.