इंसान जाने किस ग़फलत में होता है.



जो ख़ुद ही राहों पे कांटे बोता है.


दैर-ओ-हरम की लड़ाई में लुट गई बस्तियां,

मरी माँ से चिपककर, बेघर ख़ुदा रोता है.

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