ताल्लुकात

दूर मिलतें हैं ज़मीं-ओ-आसमां, ज़रूरी है.


बना रहे उफ़क़ का गुमां, ज़रूरी है.


क़रीब आते ही बढ़ जातीं हैं दूरियां,


एक फासला हमारे दरमयां, ज़रूरी है.

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