उम्मीद

ज़िन्दगी लम्हा दो लम्हा ठहरने तो दे.

गिरह -ए- ग़म से उम्मीद का धागा सुलझने तो दे.

यहीं कहीं है बहार राहत की,

खारों से भरे शाखों को ज़रा बहकने तो दे.

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