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चलो हादसा एक हसीन करतें हैं. मौसम के वादे पर यक़ीन करतें हैं. हुस्न पर ऐतबार कौन नहीं करता, ये ग़लती तो बड़े बड़े ज़हीन करतें हैं.
इंसान जाने किस ग़फलत में होता है. जो ख़ुद ही राहों पे कांटे बोता है. दैर-ओ-हरम की लड़ाई में लुट गई बस्तियां, मरी माँ से चिपककर, बेघर ख़ुदा रोता है.
पतंगों के दरम्यान जो दूरी है. उनकी   कोई   मजबूरी   है. रिश्ते     क्या    हैं    पेंचे    हैं, इक  फ़ासला  बहुत  ज़रूरी   है.
कितनी शिरी में लिपटी मेरी जान तेरी ज़ुबान है. ज़ुबान  है या रसगुल्ले की दुकान है. मुझे है शक्कर, और चख रहा हूँ लब-ए-शक्कर, मेरी जान तेरा आशिक़ दो दिन का मेहमान है.

इश्क़

वो मेरा इंतिहा भी है, इब्तिदा भी. मुझमें मौजूद भी है, मुझसे जुदा भी. इश्क़ से बच सका है कौन, इसकी ज़द में इंसा भी है, ख़ुदा भी

कब्रगाह

दबी कुचली सी हर चाह होती है. भटकी भटकी सी हर राह होती है. ग़रीब की आँखें आँखें कब होतीं हैं, ये तो ख़्वाबों की कब्रगाह होती है.

हश्र - ए- इंसान

सितारे हँसतें हैं सितारों के हश्र पर. जो कभी अर्श पर, तो कभी फर्श पर. ज़मीन चीखती है, सुन ऐ मगरूर आदमी, हर जान चल रही है, अपने अपने कब्र पर.