Posts

इश्क़

वो मेरा इंतिहा भी है, इब्तिदा भी. मुझमें मौजूद भी है, मुझसे जुदा भी. इश्क़ से बच सका है कौन, इसकी ज़द में इंसा भी है, ख़ुदा भी

कब्रगाह

दबी कुचली सी हर चाह होती है. भटकी भटकी सी हर राह होती है. ग़रीब की आँखें आँखें कब होतीं हैं, ये तो ख़्वाबों की कब्रगाह होती है.

हश्र - ए- इंसान

सितारे हँसतें हैं सितारों के हश्र पर. जो कभी अर्श पर, तो कभी फर्श पर. ज़मीन चीखती है, सुन ऐ मगरूर आदमी, हर जान चल रही है, अपने अपने कब्र पर.

पैदाइश

नया -  नया सा है दिन,  किसी नए की तैयारी है. जो खुली आँखों में भी ख़्वाबों का आना जारी है. नए इरादों ने दस्तक दी है ज़ेहन पर, उम्मीद उम्मीद से है, दिल का पैर भारी है.

ताल्लुकात

दूर मिलतें हैं ज़मीं-ओ-आसमां, ज़रूरी है. बना रहे उफ़क़ का गुमां, ज़रूरी है. क़रीब आते ही बढ़ जातीं हैं दूरियां, एक फासला हमारे दरमयां, ज़रूरी है.

वो जो नहीं है

वो जो शब का माहताब था. और सहर का आफताब था. वर्क़ पूछतें हैं कि कहाँ गया, वो एक लफ़्ज़ किताब था ...फ़राज़ साहब के नाम.

उम्मीद

ज़िन्दगी लम्हा दो लम्हा ठहरने तो दे. गिरह -ए- ग़म से उम्मीद का धागा सुलझने तो दे. यहीं कहीं है बहार राहत की, खारों से भरे शाखों को ज़रा बहकने तो दे.